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CampNaNoWriMo: Excerpt

As I am participating in this month's CampNaNoWriMo with a target of 20,000 words and lagging behind to achieve it, just thought to share an excerpt from the novella I am trying to complete.

Tried to not to share the story but still be able to share the emotions I am trying to put in it... So, request to share your critical comments -  even if you feel you shouldn't speak the truth of disliking it :)




...चाहेगा कौन बात उसकी नहीं है, मीतू ...वो तो तुझे भी पता है की कौन तुझे नहीं चाहेगा. बात ये है की तू किसे चाहती है? कौन है जो तुझे बांधे हुए किसी अनकहे अनबुझे कसम में?
क्या बोलती मैं? मुझे नहीं पता था अनु मुझे इतना समझ सकती है. मेरी माँ ने भी इतना नहीं समझा, डैडी काफी समझते थे - पर एक लड़की के मन में क्या उथलपुथल चल सकती वो या तो उनकी पहुँच से बाहर था या उनका पुरुष मन उन्हें चेष्टा ही नहीं करने देता होगा. पुरु लेकिन मुझे पूरा समझता था, मुझसे भी ज्यादा, बहुत ज्यादा। पर अनु की उस बात ने मेरे अन्दर के चोर को रंगे हाथ पकड़ा था. 
...न बताना हो तो मत बता. मैं लगती ही कौन हूँ?
नहीं अनु, वैसा कुछ नहीं . बस मुझे लडको से करीब होना नहीं पसन्द. तू समझ रही है न? 
हाँ  समझ रही हूँ, जो तो बोल रही है वो भी और जो तू छिपा रही वो भी.
फिर मैंने कुछ बोला  उसने कुछ पूछा . हम तारों को देखते रहे, और बस देखते रहे. वो अघोरे पक्ष की रात थी, हमारी सबसे प्यारी रातउस पक्ष में सबसे ज्यादा तारे दीखते थे, पर ये रात ख़ास थी. इस रात हमें टूटते तारे भी दिखे, और  जाने क्या हुआ मुझे के मैंने अनु से पूछा ...
एक बात बोलूं बहना? गुस्साएगी तो नहीं?
अनु ने एक लम्बी सांस ली, और मेरे हथेली पे अपनी हथेली रख दी. इस बार की होली में अभी कुछ दिन बाकी थे. अट्ठारह या उन्नीस की होली थी शायद. मौसम में अभी उतनी गर्मी नहीं थी. रातों को एक हलकी चादर अभी भी लगती थी. और हम सहेलियां छत पे एवे ही लेटी पड़ी थी, एक कार्डिगन मे. ये कार्डिगन मेरी माँ ने बनाई  थावो सिलाय बुनाई में उतनी कुशल तो नहीं थीं, पर मेरे लिए कुछ बनाना उनके स्नेह दीखाने का एक अद्भुत तरीका . कभी कभी मैं सच में सोचती कोई इतना प्यार करते हुए भी क्यूँ कठोर हो सकता है? क्या समाज इस कदर किसी को दबा सकता की उन्हें अपनों की ही ख़ुशी दीखे? फिर प्रश्नों के दरिया में तैरते हुए मैं उस किनारे पहुँच जाती जहाँ मुझे खुद का प्रतिबिम्ब दीखता. इसी कठोर प्यार में तो मैंने उसे इस कदर मजबूर कर दिया की रोते हुए भी वो राजी हो गया था.
एक  लड़का था मेरे स्कूल में ... 
फिर?
कभी  कभी ऐसे ठन्डे जवाब देती थी अनु के समझ भी नहीं आता था के आगे बोलूँ भी या नहीं. मैंने कुछ न बोला. तारों में कुछ खोजने का प्रयत्न करने लगी, वास्तव में जो हिम्मत करके मैंने उसे बोलना शुरू किया था वो शर्मिंदगी में बदल चुकी थी. और फिर शर्मिंदगी छिपाना अपने आप में बड़ा काम होता  है. मैंने अपने हाथ समेट के सिरहाने रख दिये. फिर वोही ख़ामोशी ... इस खामोशी से शायद किसी पुराने जन्म का हिसाब था. पुराने जन्म की भी क्या बातें हैं, जो हम इस जन्म में नहीं पा सकते, या जिनके कारणों की समीक्षा हम आज के पैमानों पे नहीं कर पाते और जिन पराजयों को हमें स्वीकारने की हिम्मत नहीं होती उन्हें हम पिछले जन्म के पापों के मत्थे धर देते.
बोलेगी कुछ या फिर से कुढ़ गयी?
कुछ नहीं ...
किस लड़के की बात रही थी? अभिजीत?
छिः
इसमें  छिः की क्या बात है?
बक्क, मुझे सच में वो नहीं पसंद है. तेरे कहने पे ही उस जैसे चेप से बात की मैंने? तो कैसे लडको से दोस्ती कर लेती है? और देख मैंने तुझसे पूछा  भी नहीं की उसने मेरे बारे में  कुछ  बोला या पुछा क्या ? बोल?
नहीं बाबा. अच्छा मुझे  मुझे माफ़ कर दे प्लीज़?
ओके .
अब बताएगी?
क्या?
दिमाग खराब करेगी झल्ली के बताएगी उस लड़के के बारे में, और उसने जोर से एक घूंसा मेरे पेट में जड़ डाला ....



Will try to share more in coming days... But, don't forget to share your critical comments -  even if you feel you shouldn't speak the truth of disliking it :)

Enhanced by Zemanta

Comments

  1. Hey beautifully written...loved the poetic feel to it. The dialogues are not breaking the flow...I love it when the story flows well.


    Just one point, do edit it again. I think at few places you can add Hai etc. Just run a check on Hindi. And I would come back to read again for sure!

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  2. There is some problem with transliteration, like I write in english and google transliterate it in hindi script, so there is always some errors and that shows up differently on different browsers.


    Thanks for pointing out, I read it again and found the errors. You know someone has said that you should revisit your writeup after a while and then you would be able to see the errors you might have missed..Thanks :)

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  3. Shashiprakash saini27 July 2013 at 21:24

    काफी अच्छा लिखा हैं जनाब
    झूठी तारीफ़ नहीं कर रहा हूँ
    कुछ दिन हुए मैंने प्रेमचंद जी की निरमला पढ़ी
    कुछ वैसे ही अहसास हुआ हैं

    आपको देख हमे भी लगा रहा हैं गद्य पे हाथ अजमाना चाहिए

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  4. प्रेमचंद जी का उल्लेख थोडा ज्यादा ही हो गया @Shashiprakash saini जी :) पर, आपको अच्छा लगा तो खुशी हुई, कोई कमी लगी हो तो वों भी बताएं...

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